Thursday, 29 September 2016

कबीर बानी

मेरे प्रिय संत कवि कबीर का अत्यन्त प्रसिद्ध पद मैं यहाँ उद्धृत कर रही हूँ, प्रयास है कि इसकी सार्थकता से पाठकों को अवगत करा पाऊँ।

मोकों कहाँ ढूंढें बन्दे, मैं तो तेरे पास में ।
ना मैं देवल न मैं मसजिद, ना काबे कैलास में ।
ना तो कौन क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में ।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तालास में ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में ।

भावार्थः सर्वव्यापी अनंत परमात्मा के सन्दर्भ में कबीर ने क्या शानदार और जानदार बात कही है -
ऐ इंसान! तू मुझे खुद से बाहर कहाँ ढूँढता फिर रहा है, जबकि मैं तो खुद ही तेरे अंदर बसा हुआ हूँ ।
न तो मैं देवालय/मंदिर में तुझे मिलूँगा, न मस्जिद में, न काबा और कैलास जैसे दुर्गम स्थानों पर ।
न किसी तरह के आडम्बर और कर्म कांड से तू मुझे प्राप्त सकता है, न ही योग से, न ही घर-बार छोड़ के विरक्त हो कर ।
अगर तू मुझे सच्चे दिल से खोजना चाहता है, तो मैं जल्दी ही तुझे मिल जाऊंगा और मुझे पाने में तुझे केवल क्षण भर ही लगेगा ।
कबीर कहते हैं कि सुनो साधु सज्जनों ! हर प्राणी की साँसों में परम तत्त्व बसा हुआ है ।

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